Didi जंगल में मदद की ज़रूरत वाले जानवर और पौधे दोस्तों से लगातार मिलती है।
जब भी वह मदद करने जाती है, सामने एक दोराहा आ जाता है — एक तरफ़ सच में मदद का रास्ता, और दूसरी तरफ़ ऐसा रास्ता जो दोस्त को और परेशान कर देता है।
कौन सा रास्ता चुनने पर वह सच्ची रक्षक बनेगी? अंत में शुरुआत में देखे उस लाल कान वाले कछुए का राज़ भी खुल जाता है।
तालाब के किनारे दिखे लाल कान, क्या यह सही है?
मोहल्ले के तालाब से गुज़र रही थी, तो चट्टान पर एक कछुआ धूप सेंक रहा था।
कान के बगल में लाल रंग की चमकती हुई पट्टी। रंग इतना चटक!
सुंदर लगा तो देर तक देखती रही, पर मन में कुछ खटक रहा था।
हमारे मोहल्ले के तालाब में तो हमेशा गोल-गोल कवच वाले कछुए ही होते थे।
पर यह लाल कान वाला दोस्त… आखिर कहाँ से आया?
घर ले जाकर पालूँ? या यूँ ही छोड़ दूँ? क्या करूँ, क्या न करूँ — बिल्कुल समझ नहीं आ रहा था।
अच्छा हुआ हाथ में WAGZAK JUMP था। उसमें "प्रकृति की रक्षा करने वाले पारिस्थितिकी रखवाले" वाला अनुभव खोला।
जंगल के बीचों-बीच दोराहा खुल गया
स्क्रीन के अंदर घुसते ही, आँखों के सामने सच्चा जंगल खुल गया।
पेड़ भी हैं, तालाब भी है, और छोटे जानवर इधर-उधर भाग रहे हैं।
आज से मैं इस जंगल की पारिस्थितिकी रखवाली हूँ।
पर एक-एक कदम पर पैरों के नीचे दोराहा प्रकट होता जाता है।
एक तरफ़ हरा तीर, दूसरी तरफ़ लाल तीर।
"मदद का रास्ता कौन सा है?" — चुनने पर हर बार क्या होता है, यह दिखाएगा। उफ़, दिल धड़कने लगा!
पहला दोराहा — फँसा हुआ भालू
जंगल की गहराई में छाती पर सफ़ेद अर्धचंद्र निशान वाला एक बड़ा भालू मिला।
अर्धचंद्र-छाती वाला भालू है। हमारे देश के पहाड़ों में रहता है, जिसकी संख्या इतनी कम है कि उसे ज़रूर बचाना है।
पर पैर हिला नहीं पा रहा, कराह रहा है। ध्यान से देखा तो रस्सी जैसी कोई चीज़ पैर में लिपटी है।
किसी ने पहाड़ पर चुपके से फंदा रखा था। जानवरों को पकड़ने का जाल।
तो, दोराहा। कौन सा?
लाल रास्ता — डर के मारे अनजान बनकर निकल जाऊँ।
भालू वैसे ही बँधा रहेगा, कराहता रहेगा। ज़ख़्मी पैर और दुखेगा। नहीं, यह सही नहीं।
हरा रास्ता — "थोड़ा रुको, मैं खोल देती हूँ!" कहकर फंदा धीरे-धीरे खोलूँ।
मैंने बिना झिझक हरा चुना!
रस्सी संभाल-संभालकर खोली, तो भालू ने पैर छुड़ाया और घास के मैदान में हौले-हौले चलने लगा।
एक भी ज़ख़्म नहीं! अहह, राहत मिली।
फंदा रखने वाले के मन में शायद बुराई नहीं रही होगी। फिर भी पहाड़ तो जानवरों का घर है।
उस घर में ख़तरनाक जाल नहीं रखना चाहिए — यह बात अब मैं भी समझ गई। भालू भाई, तुम सुरक्षित रहे, बहुत अच्छा हुआ!
दूसरा दोराहा — मुट्ठी भर बलूत
थोड़ा और आगे गई तो जंगल की ज़मीन पर बहुत सारे बलूत बीज गिरे हुए थे।
कोई अंकल उन बीजों को मुट्ठी भर-भर के बटोर रहे थे। सुंदर लगे होंगे, इसलिए ले जाने वाले थे।
बगल में एक गिलहरी बलूत को मुँह में लेने ही वाली थी, पर रुक गई और बेचैन हो गई।
फिर दोराहा। कौन सा?
लाल रास्ता — मैं भी सुंदर समझकर जेब भर-भर के बटोर लूँ।
तब गिलहरी और जंगली सूअर दोस्तों की सर्दी की भोजन-व्यवस्था ख़त्म हो जाएगी। भूखे रहने वाले दोस्त बन जाएँगे। नहीं, यह नहीं चलेगा।
हरा रास्ता — बलूत बीज वहीं पर रहने दूँ, केवल आँखों से देखकर खुश हो जाऊँ।
मैंने हरा रास्ता चुना!
"अंकल, बलूत तो जानवर दोस्तों की सर्दियों की खुराक है।" — धीरे से बताया तो अंकल ने "अरे, मुझे नहीं पता था। जानवरों का खाना ले जाने वाला था।" कहते हुए बलूत बीज वापस सावधानी से रख दिए।
अंकल भी बुरे नहीं थे, बस उन्हें पता नहीं था। पता चलते ही हाथ रोक लिया।
सच कहूँ तो मेरा भी सुंदर देवदार के बीज उठा लाने का मन कभी-कभी करता था। पर अब नहीं करूँगी। हमारे लिए छोटा सा बीज है, पर किसी और के लिए वो भरपेट भोजन है।
तीसरा दोराहा — प्यार में दिए गए बिस्किट
जंगल से बाहर निकलते समय कोई व्यक्ति गिलहरी को बिस्किट दे रहा था।
"बहुत प्यारी है ना~" कहते हुए मुस्कुरा रहे थे। यह भावना मैं भी समझती हूँ। प्यारा कुछ दिखे तो कुछ-न-कुछ बाँटने का मन करता ही है।
पर फिर दोराहा खुल गया। कौन सा?
लाल रास्ता — मैं भी बगल में बैठकर बिस्किट दूँ।
जानवर को इंसानी खाने का स्वाद लग जाए, तो वह खुद खाना ढूँढ़ने का तरीक़ा भूलने लगता है। फिर अकेले जीना मुश्किल हो जाता है। अरे, यह तो मदद नहीं हुई!
हरा रास्ता — बिस्किट अंदर रख दूँ, दूर से चुपचाप देखती रहूँ।
मैं चुपके से हरे रास्ते की ओर।
"खाना देने से उल्टा परेशानी होती है। दूर से देखना ही सबसे अच्छा है।" — धीरे से कही तो उन्होंने "अरे, प्यार करने का तरीक़ा अलग होता है" कहते हुए बिस्किट वापस रख लिए।





















